स्वयं पर एक हास्य कविता

बहुत दिनों के बाद ब्लॉग पर मैंने स्वयं पर एक हास्य कविता लिखी है, पाठक स्वयं पर न समझें ।
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समयाभाव, व्यस्तता ने धुरंधरो को भी धूल चटा दी ।
उसे ही माना सबने जिसने पुस्तक बेचकर दिखा दी ।।
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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

हे दीमकों के पालनहार
हे रद्दियों के उद्गार
विनती मेरी तुमसे बारंबार ।
अब होश में आओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ ।
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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

हे उबाईयों के सृजनहार
हे आलसियों के सरदार
अब जाग भी जाओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ


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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

लायब्रेरी की धूल पूछे
और कोसें अलमारियां
ग्रंथपालों की बेकारियों पर
कुछ तरस खाओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ
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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

हे प्रकाशकों के दिवालियेपन
हे बुकस्टालों के गिरे मन
अब मान भी जाओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ
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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

हे पुरूस्कारों के एकत्रालय
हे सम्मानों के संग्रहालय
पाठकों से भी न्याय कराओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ
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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

हे संस्कृति विभाग के परिदानी
बिना काम की पेंशन है बेईमानी
सरकार का न खर्च बढ़ाओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ
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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

हे भयभीत पत्रकार
हे छुपे हुए कलाकार
न करो लेखनी से अत्याचार
कुछ तो खुद को लजाओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ
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हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ

हे किताबों के निःशुल्क वितरक
हे व्यावहारिकता के रिक्तक
भेंटों में भी
तरलता पसंदगी लाओ

हे कलमवीर,
अब और न कचरा फैलाओ
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